सती प्रथा : प्रारंभ एवं अंत | Sati practice: beginning and end | Academic Hub

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     भारतीय समाज में एक चर्चित कुप्रथा प्रचलित रही है, जिसे सती प्रथा के नाम से जाना जाता था। इस प्रथा का सबसे वीभत्स्य रूप मधयकालीन भारतीय समाज में देखने को मिलता है जिस समय भारत की भूमि अरबी आक्रमणों से त्रस्त थी और जिस समय मुस्लिम साम्राज्य भारत में अपने पैर पसार रहा था। इस समय भारत में जहाँ – बंगाल, उड़ीसा, बिहार जैसे स्थानों पर यह प्रथा सती प्रथा के रूप में प्रचलित थी, तो वहीं राजस्थान, गुजरात, मेवाड़, मालवा जैसे क्षेत्रों में यह ” ज़ौहर ” के रूप में मौज़ूद था, जिसके तह्त रानियाँ अपने को दहकती आग में झोंक देती थीं।

ऐतिहासिक पृष्भूमि एवं प्रमाण 

सती प्रथा को प्राचीन हिन्दू समाज की कुरीति के रूप में देखा जाता है, कहा जाता है कि यह प्रथा प्राचीन हिन्दू समाज में व्याप्त थी तथा यह उसी समाजिक व्यवस्था की पैदाइश है। परन्तु इस बात का विरोध, कि सती प्रथा प्राचीन हिन्दू समाज की देन है, कई विद्वानों ने इस तर्क द्वारा किया है कि – भारतीय प्राचीन साहित्यों में से किसी में भी सती प्रथा का उलेख नहीं मिलता। वेदों – उपनिषदों में इस प्रथा का जिक्र तक नहीं है। सती प्रथा उन्मूलन के अग्रदूत राजा राममोहन राय ने प्राचीन ” हिन्दू समाज का संविधान ” मनुस्मृति में इस प्रथा का ज़िक्र न होने का सन्दर्भ देकर ही सती प्रथा का प्रबल विरोध किया था।

सती प्रथा में जिस किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती थी ,उस स्त्री को अपने पति की चिता पर बैठ कर आत्मदाह करने के लिए विवश किया जाता था। 

संभवतः इस प्रथा का नामकरण भगवन शिव की पत्नी ” सती ” के यज्ञ-कुंड में आत्मदाह करने से सम्बंधित लगता है, किन्तु इस प्रथा की तुलना सती-दहन से नहीं की जा सकती क्योंकि न तो सती के पति का देहांत हुआ था और न ही सती किसी चिता पर बैठी।

सती प्रथा का सर्वप्रथम उल्लेख एरण अभिलेख में हुआ है जिसमे वर्णन है कि – गुप्त सम्राट भानुगुप्त का राजयपाल गोपराज जो हूणों से लड़ते हुए मारा गया, की पत्नी जल कर मर गई। इस अभिलेख को सती प्रथा के  प्राचीनतम उल्लेख के रूप में माना जाता है। परन्तु इस लेख के आधार पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रथा प्राचीन भारतीय समाज से साधारण रूप से व्याप्त थी क्यूंकि तत्कालीन गुप्त, वाकाटक, नाग आदि जैसे ब्राह्मण राजवंशों में से किसी भी राज्य की रानियों ने इस प्रथा का अनुसरण नहीं किया और ना ही समाज में इसके होने का उल्लेख ही मिलता है।

सती उन्मूलन और  राजा राममोहन राय

प्राचीन वैदिक धर्म के तत्व को लुप्त हुए सहस्त्रों वर्ष हो चुके थें, केवल उसका बाह्य रूप रह गया था जिसको हिन्दू धर्म कहते थे। शुद्ध वैदिक यज्ञ के स्थान पर पशुओं की बलि दी जाती थी, सैकड़ों देवी-देवताओं के सम्मुख भैंसे और बकरे चढ़ाएं जाते थे। तत्कालीन समाज का पुरोहित वर्ग पति की मृत्यु पर पत्नी को स्वर्ग का प्रलोभन तथा सामाजिक दंड का भय दिखाकर बलपूर्वक पति की लाश के साथ जीवित जला थे और सती-सती का ढिंढोरा पीट देते थे।

मध्यकाल में राजा राममोहन राय भारतीय समाज में सामजिक सुधार के प्रातः काल के तारे ( Morning star of Reformation ) की तरह उभरें। उन्हें महिलाओं पर हो रहे इस अत्याचार से शिकायत थी कि लोग वेद, शास्त्र को पुकारते हैं किन्तु चलते हैं उसके विपरीत। राजा राममोहन राय ने इस बुराई के विरुद्ध समाज के प्रभुद्ध वर्ग से अपील की, कि वे इस अमानुषिक कृत्यों के विरुद्ध आए जिसके फलस्वरूप बंगाल में सती-प्रथा को समाप्त करने के लिए कुछ प्रबुद्ध हिन्दुओं ने प्रयास शुरू कर दिए।

प्रथा का अंत 

राजा राममोहन राय के प्रयत्नों के प्रसंग में कलकत्ता के हिन्दुओं ने अगस्त 1818 एक विरोध पत्र में सती-प्रथा को घोर अमानवीय बताया तथा सरकार से यह आशा की, कि वह भविष्य में इसे काम करने का प्रयास करें। बंगाल प्रेसिडेन्सी के पुलिस अधिकारी ने नवंबर 1818 में सरकार के आज्ञापत्रों की प्रभावहीनता की ओर संकेत करते हुए सुझाव दिया कि सात-प्रथा भारतियों में बिना किसी असंतोष को जन्म दिए समाप्त की जा सकती है क्योंकि विधवा स्त्रियाँ स्वेछा से सती नहीं होती हैं।

1824 ईस्वी में निजामत अदालतों के जजों ने यह घोषणा की, कि सती-प्रथा को रोकने के लिए प्रतिबन्ध लगाने से अच्छा होगा कि इस कु-प्रथा की समाप्ति के लिए कानून बनाकर भारत में पूर्ण समाप्त घोषित कर दिया जाए।  

इस प्रकार लार्ड विलियम बैंटिक के भारत आगमन से पूर्व भी अंग्रेज अधिकारी इसके प्रति जागरूक थे। उस समय सती होने वाली विधवाओं की संख्या तेज़ी से बढ़ रही थी। कभी-कभी पूर्वी प्रांतों में एक वर्ष में ही सती होने वाली विधवाओं की संख्या 800 तक पांच गयी। अतः लार्ड विलियम बैंटिक ने इस अपराध पर शीध्र प्रतिबंध लगाने का निश्चय किया। अंततः 4 दिसंबर 1829 में सदियों से चली आ रही इस घृणित प्रथा पर रोक लग सका।

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