आर्य-सभ्यता (वैदिक-काल) part-1

आर्यों की आदि-भूमि – आर्यों के मूल स्थान के प्रश्न पर विद्वानों में बहुत मतभेद है। आज तक यह निश्चित नहीं हो पाया है कि आर्य कौन थे और वे भारत में कहाँ से आये अथवा भारत ही उनका मूल निवास -स्थान था। इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने भाषा-विज्ञान,शरीर-रचनाशास्त्र,पुरातत्व तथा शब्दार्थ विकास-शास्त्र के आधार पर चार सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है ;- arya-sabhyata Vedic Period part- 2

      (1) भारतीय सिद्धांत – पंडित गंगानाथ झा ने आर्यों का मूल स्थान ब्रह्मर्षि देश बतलाया है।दी डी.त्रिवेदी ने मुल्तान प्रदेश में देविका नदी घाटी बतलाया है। श्री अविनाश दस और बाबू सम्पूर्णानन्द ने ‘सप्तसिन्धु’ को आर्यों का मूल स्थान बतलाया है। डॉ. राजबली पांडेय के अनुसार उनका निवास-स्थान मध्य देश था। भारतीय सिद्धांत के समर्थकों का कहना है कि आर्य-ग्रंथों में आर्यों के कहीं बाहर से आने का उल्लेख नहीं पाया  जाता है बल्कि इसके विपरीत आर्य-ग्रंथों में सप्तसिंधु का ही गुणगान किया गया है। इन विद्वानों का यह भी कथन है कि वैदिक साहित्य आर्यों की रचनाएँ हैं। ऋग्वेद में जिस भौगोलिक स्थिति का उल्लेख है, उसके अनुसार ऋग्वेद की रचना करने वाले  व्यक्तियों का निवास-स्थान पंजाब और उसके आस-पास का रहा होगा।

 (2) ध्रुव  प्रदेश अथवा आर्कटिक प्रदेश का सिद्धांत – आर्यों का मूल स्थान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने ध्रुव-प्रदेश बतलाया है। अपने मत के समर्थन में उन्होंने ऋग्वेद में उल्लिखित लम्बी और छह महीने के दिन-रात का आधार लिया है। उस प्रदेश में अत्यधिक हिमपात का उल्लेख है। तिलक जी का कहना है कि जिस समय आर्य उत्तरी ध्रुव प्रदेश में निवास करते थे उन दिनों वहाँ हिम-पात न था लेकिन कालान्तर में हिम-पात के कारण वहाँ से प्रस्थान करना पड़ा। परन्तु इस सिद्धांत के समर्थक बहुत कम हैं।

 (3) मध्य एशिया का सिद्धांत – प्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आर्यों का मूल स्थान मध्य एशिया था। इसके समर्थन के लिए उन्होंने आर्यों के प्राचीन वेदों व पारसियों के धर्म-ग्रन्थ अवेस्ता में वर्णित भौगोलिक स्थितियों का आधार लिया है। उनके अनुसार आर्यों का प्रमुख उद्यम खेती और पशुपालन था। इसके लिए मध्य ऐसा मैदान है जहाँ आरा कृषि और पशुपालन का कार्य बड़ी सुविधापूर्वक सम्पन्न कर सकते थे। धीरे-धीरे आर्य यूनान, ईरान और भारत की ओर अग्रसर हुए। इसका कारण यही हो सकता है कि उनकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव अथवा प्राकृतिक परिवर्तन के कारणों ने उन्हें अग्रसर होने के लिए बाध्य किया हो। एशिया माइनर में बोगज़कोइ नमक स्थान पर जो अभिलेख प्राप्त हुआ है, उसमे वैदिक देवताओं जैसे – मित्र, वरुण, इंद्रा आदि के रूपांतरित नामों का उल्लेख है। यह अभिलेख 1400 ई. पू. का है। इसके आधार पर कुछ विद्वानों ने यह अनुमान लगाया है कि एशिया माइनर ही 1400 इ. पू. में आर्यों का मूल स्थान रहा होगा। इस सिद्धांत के विपक्ष में यह कह जा सकता है की ऋग्वेद और अवेस्ता में जिन भौगोलिक परिस्थितियों का उल्लेख है, वे मध्य एशिया में विधमान नहीं हैं।

  (4) यूरोपीय सिद्धांत- भाषा-विज्ञान के आधार पर कुछ विद्वानों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि  आर्यों का मूल निवास-स्थान यूरोप था क्योंकि आर्यों की काफी संख्या यूरोप के विभिन्न देशों में पायी जाती है।  सर विल्लियम जोन्स ने भाषा की समानता का आधार लिया है। आर्यों की भाषा के कुछ शब्द अन्य भाषों के कुछ शब्दों से समानता रखते हैं. ‘पाटर , गोथिक के ‘फदर’ तोरवारियन के ‘पॉटर और अंग्रेजी के ‘फॉदर आदि शब्दों से साम्य रखता है। इसी प्रकार संस्कृत का ‘दौ’ शब्द लैटिन के ‘दुऔ’ , आयरिश के ‘दो’ , गोथिक के ‘त्वई’ , ‘लुथियानियन के ‘द’ और अंग्रेजी के ‘टू’ शब्द से समानता रखता है। इससे यह ज्ञात होता है कि इन भाषाओं को बोलने वाले कभी एक स्थान पर निवास करते रहे होने।

(क) ऑस्ट्रिया में हंगरी का मैदान – डॉ. पी. गाईल्स ने आर्यों का आदि देश ऑस्ट्रिया में हंगरी का मैदान बतलाया है। इस मैदान में जो पशु और वनस्पति, जैसे – गाय, बैल, कुत्ते, गेहूँ और जौ अदि पाए जाते है, उनसे आर्य भलीभांति परिचित थे। अतः ऑस्ट्रिया में हंगरी का मैदान आर्यों का आदि देश रहा होगा। पर यह सब बातें कोई ठोस तथ्य पर आधारित नहीं हैं, जैसा कि काला महोदय ने लिखा है, ” हमें कोई भी पशु, वृक्ष ऐसा नहीं ज्ञात है जो पूर्णतः और मूलतः यूरोपीय हो और जिसका पूर्व तथा पश्चिम की आर्य भाषाओँ में एक ही नाम हो। ”

(ख) जर्मन प्रदेश – पेनका ने आर्यों की आदि देश जर्मन बतलाया है। इन्होने भाषा के स्थान पर जातीय गुणों तथा पुरातत्व का सहारा लिया है। उदाहरण के लिए आर्यों के बाल भूरे रंग के होते थे और जर्मनी में रहने वालों के बाल अब भी भूरे रंग के होते हैं। इसी प्रकार शारीरिक विशेषताओं में काफी समानता है।

 (ग) दक्षिण रूस – नेहरिंग ने दक्षिण रूस के मैदान को आर्यों का मूल-स्थान बतलाया है। इनका तर्क यह है कि यह मैदान शीतोष्ण कटिबन्ध में स्थित है। कृषि, पशुपालन तथा वनस्पति आदि की यहाँ अधिकता है। ये प्रमुख बातें आर्यों के जीवन से विशेष सम्बंधित हैं। अतः यही आर्यों का मूल स्थान होगा।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद । आर्य सभ्यता (वैदिक काल) part – 2

3 COMMENTS

  1. […] आर्यों का भारत में प्रसार – vedic civilization आर्यों के मूल निवास-स्थान के सम्बन्ध में आज भी विवाद है। किन्तु अधिकतर मान्यता उस प्रदेश की है जो समुन्द्र से डेन्यूब नदी तक फैला हुआ है। अनुमान किया जाता है कि आर्यों ने कम-से-कम चार या साढ़े चार हज़ार वर्ष पूर्व भारत-भूमि में उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर से प्रवेश किया। मार्ग में अपने दल इधर-उधर छोड़ते गए। वे सबसे पहले अफगानिस्तान और पंजाब में बसे । आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में अफ़ग़ानिस्तान की काबुल, खुर्रम, स्वात तथा गोमल नदियों एवं पंजाब की सात नदियों-सिंधु, झेलम (वितस्ता) , चिनाब (अस्कनी ), रावी (परुष्णी ) , व्यास (विपासा) , सतलज (शतुद्रि ) और सरस्वती आदि का उल्लेख मिलता है। इन सात नदियों के नाम पर इस प्रदेश का नाम आर्यों ने सप्त सिंधु’ या ‘सप्त सैंधव’ रखा। यहीं आर्य-सभ्यता का बीजारोपण हुआ और यहीं से आर्य लोग भारत में फैले। Vedic Period […]

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