China Tibet dispute and Dalai Lama (चीन तिब्बत विवाद और दलाई लामा।)

China Tibet dispute andDalaiLama

तक़रीबन 800 साल पहले युआन राजवंश के शासकों ने जो कि चीन में सत्तारूढ़ थे, ने तिब्बत को अपने अधीन कर लिया। उसके बाद से सं 1912 तक तिब्बत चीन का अभिन्न हिस्सा बना रहा।
सं 1912 में 13वें दलाई लामा ने तिब्बत को चीन का हिस्सा न मानकर तिब्बत को स्वतन्त्र घोषित कर दिया और तिब्बत के लोगों ने भी उनकी बात मानी और उनका समर्थन किया। दलाई लामा को तिब्बत के लोगों का समर्थन मिलने का कारन था कि वहाँ के लोग दलाई लामा को तिब्बत का राजनैतिक एवं आध्यात्मिक गुरु मानते है।

दलाई लामा – दलाई लामा किसी एक व्यक्ति विशेष का नाम नहीं है। यह एक ‘पदनाम’ (औदा ) है। इस समय जो दलाई लामा है वे 14वें दलाई लामा है जिनका असली नाम ‘ल्हामो दोंदरूब’ है। इनसे पहले भी 13 दलाई लामा रह चुकें है।

– सं 1914 में तत्कालीन भारत ( अंग्रेज ) सरकार, चीन और तिब्बत के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता करने का प्रयास किया गया जिसपर भारत और तिब्बत ने हस्ताक्षर किये लेकिन चीन ने नहीं किया।
इसके बाद चीनी सेना ( Chinese People’s Liberation Army ) ने तिब्बत में घुसपैठ कर उसपर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद चीन ने तिब्बत सरकार को ‘ Seventeen Points Agreement ‘ पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया और बदले में चीन ने कहा कि हम तिब्बत के राजनैतिक व्यवस्था और तिब्बत के लोगों के धर्म (तिब्बतन बुद्धिज़्म ) का संरक्षण करेंगे।
परन्तु चीन ने ऐसा नहीं किया और उन्होंने इस समझौते का उलंघन किया और चीन ने तिब्बत के लोगों उनके धर्म एवं उनकी संस्कृति को मिटाना शुरू कर दिया। इसके विरोध में 10 मार्च 1959 को ‘National Uprising Day’ का आयोजन हुआ। जहाँ तिब्बत के लोगों ने लासा स्थित ‘पोटाला पैलेस’ को घेर लिया ताकि 14वें दलाई लामा की जान बच जाए। फलतः 14वें दलाई लामा 14 वर्ष के उम्र में अपनी जान बचाकर वहां से भागे और ‘तवांग’ के रास्ते भारत आ गये। इसके बाद से ही चीन द्वारा तिब्बत के धर्म और संस्कृति को योजनाबद्ध तरीके से ख़त्म किया जा रहाहै, उन्हें नष्ट किया जा रहा है।

इसी पर जोर देते हुए 10 अक्टूबर 1989 को नोबल शांति पुरस्कार ग्रहण करते समय दलाई लामा ने कहा था ” तिब्बत के लोग अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान के विनाश के उद्देश्य से एक क्रमबद्ध एवं योजनाबद्ध रणनीति का सामना कर रहें हैं। ”
आज भी तिब्बत चीन के विरोध में संघर्षरत्त है। और चीन द्वारा वहाँ के सोंच धर्म और संस्कृति को ख़त्म करने की कोशिश जारी है।
इसके अतिरिक्त दलाई लामा ने चीन के सामने एक प्रस्ताव रखा जिसमें उनहोंने कहा कि हम चीन का हिस्सा रहने को तैयार है, लेकिन तिब्बत को पूरी आजादी होनी चाहिए अपनी सरकार चुनने का और अपना धर्म एवं संस्कृति का पालन करने का। जिसे चीन ने स्वीकार नहीं किया है। और चीन दलाई लामा को धार्मिक गुरु न मान कर एक अलगाववादी नेता मानता है।

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