युद्ध विजय गाथा ‘ शेरखाँ ‘ से शेरशाह सूरी : (शेरशाह सूरी) Part – 2

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शेरखाँ का हुमायूँ से संघर्ष – शेरखाँ की बढ़ती हुई शक्ति से हुमायूँ बहुत सशंकित हो गया और उसकी शक्ति को दबाने के लिए आगरा से चल पड़ा। शेरखाँ ने उसका कोई विरोध नहीं किया और उसे बंगाल की राजधानी गौड़ पर अधिकार कर लेने दिया और स्वयं बिहार चला गया। गौड़ में हुमायूँ छः महीने तक आमोद-प्रमोद में मस्त रहा। जिस समय हुमायूँ राग- रंग में मस्त था, उस समय शेरखाँ बिहार और जौनपुर के मुग़ल प्रदेशों को अपने अधीन करने तथा पश्चिम में कन्नौज तक का प्रदेश लुटने में लगा हुआ था।

चौसा का युद्ध (26 जून, 1539 ) – पश्चिम में शेरखाँ की इस कार्यवाही का समाचार पाते हुए हुमायूँ गौड़ से चल पड़ा और मुंगेर में गंगा को पार किया। शेरखाँ जो पहले से ही तैयार बैठा था, आगे की ओर बढ़ा और 26 जून , 1539 को बक्सर के समीप चौसा नामक स्थान पर मुग़ल सेना को परास्त किया। इस युद्ध में कम से कम 7000, मुग़ल सैनिक मारे गए और हुमायूँ को अपनी जान बचाने के लिए गंगा में कूदना पड़ा। वह डूबने ही वाला था कि निजाम खाँ नामक एक भिश्ती ने उसके प्राण बचाये। इस युद्ध के पश्चात् शेरखाँ ने ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की।

कन्नोज का युद्ध ( 17 मई, 1540 ) – हुमायूँ चौसा में पराजित होकर आगरा पहुंचा और शेरशाह का सामना करने के लिए 90 हजार सैनिक इकठ्ठे किये और शेरशाह का, जो आगरा के तरफ बढ़ा चला आ रहा था, सामना करने के लिए चल पड़ा। कन्नोज में गंगा किनारे दोनों की सेनाएं आमने-सामने डट गई। 15 मई को अचानक वर्षा होने से मुग़ल शिविर में पानी भर गया। मुगलों के इस समस्या का लाभ उठाकर शेरशाह ने 17 मई को अचानक आक्रमण कर दिया। असावधान और असंगठित होने के कारन मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई। हुमायूँ को रणस्थल छोड़कर आगरा भागना पड़ा। इस युद्ध ने एक भी सैनिक घायल नहीं हुआ और न ही एक भी तोप दागी गई। शेरशाह ने हुमायूँ का पीछा किया और दिल्ली तथा आगरा पर अपना अधिकार कर लिया और खुद को भारत का सम्राट घोषित कर दिया।

शेरशाह की प्रमुख विजय – हुमायूँ के पलायन के बाद शेरशाह ने पश्चिमोत्तर सीमा की उचित व्यवस्था की ओर अपना ध्यान आकृष्ट किया, जिसकी दशा उस समय अव्यवस्थित थी। शेरशाह की अन्य प्रमुख विजय निम्नलिखित है।

(1) खोखरो पर विजय – झेलम और सिंधु प्रदेश के बीच खोखर प्रदेश था। सीमा के करीब होने के कारन राजनीतिक दृष्टि से यह बड़ा महत्वपूर्ण था। अतः सर्वप्रथम शेरशाह ने इस पर अधिकार करने का निश्चय किया। उसने जब खोखरो को अपनी अधीनता स्वीकार करने के विषय में लिखा, तो उन्होंने उत्तर देते हुए कहा कि ‘हम तो तीर और शेर सिपाही हैं, हमसे आप तीर और शेर के अतिरिक्त कुछ नहीं मांग सकते।’ इससे शेरशाह क्रोधाग्रि से उबल पड़ा और कहा “मै इन दुष्ट जानवरों में ऐसा पच्चड़ लगाऊंगा की क़यामत तक याद रहेगी।” उसने शीध्र ही खोखरो पर आक्रमण किया और उनके प्रदेश को बुरी तरह उजाड़ दिया। भविष्य में वे पुनः सिर न उठा सकें, इसलिए शेरशाह ने इस क्षेत्र में रोहतास नमक एक दुर्ग का निर्माण करवाया और इसकी सुरक्षा के लिए वहाँ 5,000 सैनिक तथा हैबत खां और खवास खां जैसे योग्य सेनापतियों की नियुक्ति की।

(2) बंगाल विजय ( 1541 ) – बंगाल के शासक महमूद की मृत्यु हो जाने पर वहाँ के सूबेदार खिज्र खां ने उसकी कन्या से विवाह कर लिया था, साथ-ही-साथ उसने खुद को वहाँ का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया था उसके इस कृत्य पर दण्ड देने के लिए शेरशाह ने बंगाल पर आक्रमण किया। खिज्र खां बंदी बना लिया गया। शेरशाह ने बंगाल को अनेक प्रांतो में विभक्त कर प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार नियुक्त किया जो सीधे शेरशाह के प्रति उत्तरदायी थे। शेरशाह के इस नयी व्यवस्था से सैनिक शासन के स्थान पर एक नयी शासन व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ।

(3) मालवा विजय( 1542 ) – बंगाल की ओर से निश्चिन्त हो कर शेरशाह ने मालवा की और ध्यान दिया। इस समय मालवा पर कादिरशाह स्वतन्त्र शासक के रूप में शासन कर रहा था। शेरशाह ने मालवा पर आक्रमण किया। रास्ते में उसने ग्वालियर का प्रसिद्ध दुर्ग जो अब्दुल कासिम के अधीन था, जीत लिया। तत्पश्चात वह आगे बढ़ा। उसकी शक्ति से भयभीत हो कर कादिरशाह ने आत्म-समर्पण कर दिया। शेरशाह ने शुजात खां को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया।

(4) रणथम्भौर-विजय – मालवा-विजय करने के बाद लौटते समय शेरशाह ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया। वहाँ के सूबेदार उस्मान खां ने बिना युद्ध किये दुर्ग पर शेरशाह का अधिपत्य स्वीकार कर लिया। शेरशाह ने अपने ज्येष्ठ पुत्र आदिलशाह को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया।

(5) रायसिन-विजय (1543)- मध्य भारत में स्थित रायसिन रियासत में राजपूत राजा पूरनमल चौहान शासन कर रहा था। उसने समीपवर्ती राज्यों को जीत कर अपनी सैनिक शक्ति काफी बढ़ा ली थी। उसकी शक्ति का दमन करने के लिए 1543 में शेरशाह ने रायसिन पर आक्रमण किया। 6 महीने तक दुर्ग का घेरा चलता रहा, किन्तु राजपूतों ने शेरशाह की अधीनता स्वीकार नहीं की। अंत में शेरशाह ने कुरान की शपत खाकर यह वचन दिया की राजा और उनके परिवार के साथ किसी प्रकार का दुर्व्यवहार नहीं किया जाएगा, तो पूरणमल ने आत्म-समर्पण कर दिया। उसको शेरशाह के समीप एक शिविर में ठहराया गया। शेरशाह ने कुरान की प्रतिज्ञा को ताक पर रखकर निःशस्त्र राजपूतों पर आक्रमण कर उअन्को मौत के घाट उतरवा दिया। यद्यपि राजपूतों ने अदम्य उत्साह तथा साहस का परिचय दिया। कहा जाता है कि कुछ स्त्रियाँ और बच्चे ही शेष रहें जिन्हे गुलाम बना लिया गया। वास्तव में शेरशाह जैसे महान न्याय-प्रिय शासक का यह कार्य न्यायप्रिय नहीं था और उसके उच्च चरित्र पर यह एक बड़ा भरी धब्बा है।

(6). सिन्ध तथा मुल्तान – विजय (1543) – शेरशाह के योग्य सेनापति हैबत खां नियाजी ने मुल्तान पर अधिकार कर लिया। इसी वर्ष सिन्ध प्रदेश पर भी शेरशाह का अधिकार हो गया और उसने इसलाम खां को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया।

आगे है…….
राजपूताना विजय और कालिंजर विजय तथा शेरशाह की दुर्भाग्य मृत्यु

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