राजपूताना विजय, कालिंजर विजय और शेरशाह की मृत्यु : शेरशाह सूरी Part – 3

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(7). राजपूताना विजय : (क) मारवाड़ – विजय – इस समय मारवाड़-राज्य का शक्तिशाली शासक मालदेव था। उसने अपने पड़ोसी राज्यों की स्वतंत्रता का अपहरण कर अपने साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार कर लिया था। उसकी बढ़ती हुई शक्ति से भयभीत होकर बीकानेर के राव कल्यानमल और मेड़ता के बरिमदेव ने शेरशाह को मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए निमंत्रित किया। इस अवसर का लाभ उठाकर शेरशाह ने 80,000 सैनिकों के साथ 1544 में मारवाड़ पर आक्रमण किया। मालदेव ने भी अपने विशाल तथा संगठिक सेना के साथ सामना किया। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ किन्तु राजपूतों की वीरता के सम्मुख शेरशाह को सफलता न मिल सकी। अंत में शेरशाह ने कूटनीति का सहारा लिया। उसने एक जाली खत लिखवाकर कि ‘हम राजपूत मालदेव की स्वतंत्र नीति से असंतुष्ट है, वचन देते है कि उसको पकड़ कर आपके (शेरशाह) के हवाले कर देंगे’ , मालदेव के डेरे के पास डलवा दिया। जब वह खत मालदेव को प्राप्त हुआ तो अपने साथियों के विश्वासघात को देखकर बड़ा दुःख हुआ और अंत में उसने युद्ध न करने का निश्चय किया। कुछ सरदारों ने सपथपूर्वक कहा की ‘वह पत्र जाली है आप हमपर विश्वास रखिए। ‘ यह कहकर उन्होंने अफगान सेना पर आक्रमण किया किन्तु उनकी पराजय हुई। कुछ समय उपरान्त ही जब मालदेव को सत्य का पता चला तबतक मारवाड़ पर अधिकार हो चुका था। इस युद्ध में राजपूत इतनी भीषणता से लड़े थे कि उनकी वीरता और साहस को देखकर शेरशाह ने स्वयं कहा था, “एक मुट्ठी भर बाजरे के लिए मेरा पूरा भारत का साम्राज्य चला गया होता।” शेरशाह ने मारवाड़ को दिल्ली सल्तनत में मिला ईर्सा खां नियाजी को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया।

(ख) मेवाड़-विजय – मारवाड़ पर अधिकार करने के उपरांत शेरशाह ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर आक्रमण किया और उसपर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात उसने जैसलमेर और बीकानेर पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार राजपुताना का बहुत बड़ा भाग शेरशाह के अधिकार में आ गया। किन्तु ये भू-भाग ज्यादा दिनों तक उसके अधिकार में न रह सके और शीध्र ही स्वतंत्र हो गए। शेरशाह ने राजपूत राजाओं को उनके राज्य वापस कर दिए, क्योंकि वह उनको सर्वदा अपने अधीन नहीं रखना चाहता था। वह केवल उनकी राजनीतिक स्वतंत्रता का अपहरण कर लेता था। इसी सम्बन्ध में डॉ. कानूनगो ने लिखा है, “शेरशाह ने भारत के अन्य भागों की भाँति राजपूताने में वहाँ के स्थानीय सरदारों को न तो समूल नष्ट किया और न ही उनके स्वामित्व का ही पूर्णतया अपहरण किया। उसने ऐसा करना खतरनाक और निरर्थक समझा। उसने विजितों की स्वतंत्रता को पूर्णतया समाप्त कर देने की चेष्टा नहीं की।”

(8). कालिंजर-विजय और शेरशाह की मृत्यु (1545)- राजपूताना के पश्चात् शेरशाह का ध्यान कालिंजर की और आकृष्ट हुआ। उस समय बुन्देलखण्ड में कालिंजर का दुर्ग अजेय समझा जाता था। वहॉं का शासक कीर्तिसिंह था। उसके यहाँ रीवाँ के राजा ने भागकर शरण ली थी। शेरशाह ने कीर्तिसिंह से उसको वापस माँगा, किन्तु उसने उसे देने से इंकार कर दिया। इसपर क्रोधित हो कर शेरशाह ने नवम्बर, 1544 में कालिंजर पर आक्रमण कर दिया और दुर्ग का घेरा डाल दिया। यह दुर्ग 369 मीटर (समुन्द्र की सतह से ) ऊँचा है। इसकी दीवारों के मैदान से तिरछी ऊँचाई 45 मीटर है तथा इसकी दीवारों की मोटाई बिना सीमेंट के 10.5 मीटर है। इसके चारो और एक चौड़ी खाई है। दुर्ग पर घेरा एक साल तक चलता रहा, किन्तु दुर्ग पर शेरशाह का अधिकार नहीं हो पाया। अंत में शेरशाह ने दुर्ग को बारूद से उड़ाने का निश्चय किया। 22 मई, 1545 को जब शेरशाह बारूदखाने का निरीक्षण कर रहा था तो संयोग से एक गोला नगर द्वार से टकरा कर फट गया तथा बारूदखाने में आग लग गई। शेरशाह बुरी तरह से जल गया। फिर भी उसने दुर्ग पर आक्रमण जारी रखने की आज्ञा दी। अंत में दुर्ग पर उसका अधिकार हो गयाऔर अपने विजय के समाचार को सुनने के कुछ समय उपरान्त ही उसकी मृत्यु हो गई।

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