शेरशाह की सफलता के कारण : शेरशाह सूरी Part – 4

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शेरशाह एक छोटे से जागीरदार का पुत्र था। बचपन से ही उसको अपने पिता और विमाता के क्रोध का भाजन बनकर कई बार अपने गृह का परित्याग करने के लिए बाध्य होना पड़ा था, फिर भी उसने अपने सच्ची लगन और प्रतिभा के बल से ही दिल्ली के राजसिंहासन को प्राप्त किया और हुमायूँ को भारत परित्याग करना पड़ा। संक्षेप में, उसकी सफलता के निम्नलिखित कारण बतलाए जा सकते है :

(1) सैनिक योग्यता – शेरशाह में एक उच्चकोटि के सैनिक तथा सेनापति के गुण विधमान थे। वह बड़ा ही वीर, साहसी और अदम्य उत्साही था। भीषण-से-भीषण विपत्ति के आ जाने तथा प्रतिकूल परिस्थितियों के उत्पन्न हो जाने पर भी वह विचलित नहीं होता था। चुनार के दुर्ग पर अधिकार करना, बिहार के शासक जलाल खां को मार भगाना, बंगाल पर अधिकार करना, और हुमायूँ को चौसा और कन्नौज के युद्ध में परास्त करना अदि सम्पूर्ण बातें उसकी सैनिक योग्यता को प्रमाणित करती है।

(2) लक्ष्य की प्रधानता – शेरशाह ने प्रारम्भ से ही यह लक्ष्य बना रखा था कि वह मुगलों को भारत से निकाल के ही दम लेगा और अफगान शक्ति को पुनः स्थापित करेगा। इस लक्ष्य से वह कभी विचलित नहीं हुआ, बल्कि वह अपने लक्ष्य की पूर्ति में सफल हुआ। वह लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रत्येक साधन का प्रयोग करने से नहीं हिचकता था, चाहे नैतिक दृष्टि से वह उचित हो या अनुचित।

(3) उच्चकोटि का कूटनीतिज्ञ – शेरशाह बड़ा कूटनीतिज्ञ था। किस समय शत्रु पर आक्रमण करना चाहिए और किस समय उसके मार्ग से हट जाना चाहिए, इस कला से वह भलीभाँति परिचित था। उसने हुमायूँ को निर्विरोध गौड़ तक चले आने दिया और स्वयं बिहार चला गया। जब उसे इस बात का पूर्ण विश्वास हो गया कि वह हुमायूँ को परास्त कर लेगा, तब गौड़ से वापस आते हुमायूँ को चौसा के युद्ध में परास्त किया। उसने हुमायूँ के शत्रु बहदुरशाह से गठबंधन करके उसे बड़ी संकट की परिस्थिति में डाल दिया।

(4) समय का सदुपयोग – शेरशाह की सफलता का एक बहुत बड़ा कारण यह भी था की उसने अपने समय को कभी नष्ट नहीं किया ओर न ही कभी विजय से अतिउत्साहित हुआ। जबकि हुमायूँ ने चुनार और गौड़ में क्रमशः 6 और 8 महीने अपने मूल्यवान समय को अमोद-प्रमोद में नष्ट किया और शेरशाह ने इसी समय का सदुपयोग करके अपनी शक्ति को सुदृढ़ किया। वह समय के मूल्य को भली- भांति जनता था।

(5) संगठन शक्ति – शेरशाह में संगठन करने की अपूर्व शक्ति थी। वह भली- भांति जनता था कि अफगानो को संगठित किये बिना वह मुगलों को भारत से निकलने के लक्ष्य में सफल नहीं हो सकता। उसने अफगानो को एकता के सूत्र में बांध कर एक ऐसी प्रबल सेना का निर्माण किया जो मुगलों की शक्ति का विरोध करने में पूर्णरूपेण सफल हुई।

(6) सौभाग्य का सहयोग – शेरशाह का उसके भाग्य ने सदैव साथ दिया। यह उसका सौभाग्य ही तो था कि जिस समय हुमायूँ का संधर्ष गुजरात के शासक बहादुरशाह से चल रहा था। उस समय उसने पूर्व में अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाना प्रारम्भ किया। यह शेरशाह का सौभाग्य ही था कि कन्नौज के युद्ध के समय भयंकर वर्षा हो गई और मुग़ल सेना के शिविर में पानी भर गया जिससे मुग़ल सेना पर अचानक आक्रमण करने का अवसर प्राप्त हो गया। इस तरह शेरशाह के सफलता में उसके भाग्य का बहुत बड़ा हाथ था।

(7) मितव्ययिता – शेरशाह बड़ा मितव्ययी था। एक कुशल राजनीतिज्ञ होने के कारण वह जनता था कि धनाभाव में वह एक विशाल सेना का संगठन नहीं कर सकता। फलतः उसने धन का दुरपयोग नहीं किया और राजकोष सदैव संपन्न सम्पन्न रखा। सौभाग्य से उसे चुनार के दुर्ग से बहुत सा धन मिल गया। बंगाल के शासक को परास्त करके उसने उससे बहुत सा धन प्राप्त किया। उसने धन की ही सहायता से एक विशाल सेना का निर्माण करके अपने शत्रुओ को परास्त किया। मितव्ययी होने के कारन उसे कभी धन आभाव नहीं हुआ।

( 8) अलौकिक व्यक्तित्व – शेरशाह के सफलता का मुख्य उसका अलौकिक व्यक्तित्व भी था। उसने अपने अलौकिक प्रतिभा के कारण ही जौनपुर के गवर्नर जमाल खाँ को इतना प्रभावित किया कि उसने उसके पिता हसन को सहसराम की जागीर का प्रबंध शेरशाह को सौंप देने का परामर्श दिया था। अपने अलौकिक प्रतिभा के द्वारा ही वह मुग़ल सेना में प्रवेश पा सका और उसे वहाँ सेना संबंधी अनेक जानकारी प्राप्त हो गई थी। उसके असाधारण वयक्तित्व के कारन ही जमाल खाँ की माँ दूदू बीबी ने उसे अपने पुत्र का संरक्षक नियुक्त किया और वही रहकर शेरशाह को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ था।

इस प्रकार हम देखते कि उपयुक्त गुणों के कारण शेरशाह को सदैव सफलता प्राप्त हुई भारत का एक महँ सम्राट बन सका।

आगे है…..

शेरशाह की शासन-व्यवस्था

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