‘ ग्रांड-ट्रंक सड़क ‘ और शेरशाह की शासन व्यवस्था :शेरशाह सूरी Part – 6

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(3) भूमि-प्रबंध तथा राजस्व वयवस्था – शेरशाह ने समस्त कृषियोग्य भूमि की नाप करवायी और उसको बीघों में में विभाजित करवाया। एक बीघे का क्षेत्रफल 360 वर्ग गज निश्चित किया गया। उपज के अनुसार भूमि को तीन किस्मो – अच्छी ,साधारण ,खराब में बांटा गया किसान राज्य को लगान के रूप में उपज का 1/3 भाग देते थे। किसान को ये सुविधा दी गई थी कि वे लगान (भूमिकर) नगद अथवा उपज, किसी भी रूप में दे सकते थे। भूमिकर के अतिरिक्त किसानो को भूमि की पैमाइश करने की फ़ीस के रूप में भूमि कर का 1/2 प्रतिशत से 5 प्रतिशत रकम अदाकरना परता था।
शेरशाह ने अपने अधिकारीयों को ये आदेश दे रखा था की वे भूमि कर निश्चित करते समय तो नरमी बरतें, लेकिन वसूल करते समय कोई रियायत न करे। फसल ख़राब होने पर किसान भूमिकर से मुक्त कर दिए जाते थे। सैनिक अभियान के समय यदि खड़ी फसलों को किसी प्रकार की हानि हो जाती थी तो किसान को उसकी क्षति पूर्ति कर दी जाती थी।

(4) न्याय व्यव्श्था – मध्ययुग के शासको में शेरशाह अपनी न्याय-व्यवस्था के लिए बहुत प्रसिद्ध है। उसका सिद्धांत था, ‘ न्याय के आभाव में कोई भी साम्राज्य स्थाई नहीं रह सकता दण्ड के बिना न्याय भी संभव नहीं है।’ न्याय के सम्बन्ध में वह बहुत कठोर था। वह अमीरों और गरीबों के साथ एक सामान निष्पक्ष न्याय करता था। उसने न्याय-व्यवस्था के लिए दारुल अदालतों की व्यवस्था की थी जिसमे काजी और मीर अदालती मुकदमों का फैसला किया करते थे , वह न्याय के समय किसी प्रकार का पक्षपात नहीं करता था। यहाँ तक कि वह अपने निकट सम्बन्धियों को भी न्याय के समय कोई महत्त्व नहीं देता था। फौजदारी कानून बड़ा कठोर था। फौजदारी के मुकदमे सरकारी न्यालयों में तय किये जाते थे। हिन्दू प्रायः अपने मामले पंचायतों में ही तय कर लेते थे। चोरी और डकैती के लिए प्राणदंड की व्यवस्था की गई थी। कहा जाता है कि “शेरशाह के शासनकाल में कोई भी व्यापारी रेगिस्तान में यात्रा करते हुए सो सकता था और लुटेरों द्वारा लुटे जाने का उसे कोई भय नहीं था। शेरशाह के भय और न्याय-प्रेम के कारण चोर, लुटेरे तक व्यापारियों के माल की देख-भाल करते थे।”

(5) पुलिस तथा गुप्तचर विभाग – शेरशाह के समय फौजी पुलिस ही सैनिक का कार्य करते थे। उसने स्थानीय अधिकारियों के उत्तरदायित्व के नियम के आधार पर शांति और सुरक्षा की व्यवस्था की थी। चोर- डाकुओं तथा अपराधियों का पता लगाने का उत्तरदायित्व गाँव के मुखिया पर था। यदि वो चोरों अथवा डकैतों का पता लगाने में असमर्थ रहते थे तो उनको हानि की पूर्ति करनी पड़ती थी। इसी प्रकार यदि वे अपने क्षेत्र में हुई हत्या का पता लगाने में असमर्थ रहते थे तो उनको मृत्युदण्ड दे दिया जाता था। इसके अतिरिक्त मुख्य शिकदार भी अपनी सरकारों में शांति और सुरक्षा के उत्तरदायी थे।
गंभीर अपराधों का पता लगाने तथा राजकीय कर्मचारियों पर नियंत्रण रखने के लिए शेरशाह ने गुप्तचर विभाग की स्थापना की थी। उसकी गुप्तचर व्यवस्था इतनी उच्चकोटि की थी कि राज्य की सभी घटना और उपद्रवों की सुचना सबसे पहले उसको प्राप्त हो जाती थी।

(6) सैनिक व्यवस्था – शेरशाह के पास एक विशाल और शक्तिशाली सेना थी। उसने अपनी सेना का संगठन अलाउद्दीन खिलजी के सैन्य संगठन के आधार पर किया था। वह सैनिक से सीधा संपर्क रखता था और स्वयं उनकी भर्ती भर्ती करता तथा योग्यतानुसार वेतन निश्चित करता था। सैनिकों को वेतन सीधे राज्य-कोष से दिया जाता था। उनकी पदोन्नत्ति योग्यता ओर सेवाओं के आधार पर की जाती थी। शेरशाह ने घोड़ों पर दाग लगाने की प्रथा चलाई ताकि अश्वारोही सैनिक दूसरे घोड़े दिखाकर उसे धोखा न दे सकें। उसने अपने स्थाई सेना को कई भागों में विभाजित कर दिया था और प्रत्येक भाग एक अनुभवी सेनापति के अंतर्गत आता था। उसके अधीन सेना में 1 लाख अश्वरोही, 25 हजार पैदल सेना तथा 300 हाथी थे। उसकी सेना छावनियों में रहती थी जो राज्य के विभिन्न भागों में स्थापित की गई थीं। उसके पास एक अच्छा तोपखाना भी था।

(7) मुद्रा व्यवस्था – शेरशाह ने देश में प्रचलित मुद्रा-व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण सुधार किया। उसने समस्त पुराने सिक्कों का प्रचलन बंद कर दिया और अपने नाम का चाँदी का रुपया तथा ताँबे का सिक्का चलाया जो ‘दाम’ कहलाता था। चाँदी का रुपया और दाम में 64:1 का अनुपात था।

(8) सड़क और सरायें – शेरशाह ने अपने साम्राज्य में कई बड़ी-बड़ी सड़कों का निर्माण करवाया जो राज्य के अनेक प्रमुख नगरों का सम्बन्ध राजधानी से जोड़ती थीं। उसकी चार प्रमुख सड़क इस प्रकार हैं : –

१. ,वर्त्तमान ‘ग्रांड-ट्रंक सड़क’ – यह कलकत्ता से पेशावर तक जाती है। इसी सड़क पर आगरा, दिल्ली, तथा लाहौर पड़ते हैं। इसकी लम्बाई 4800 किमी. है। यह सड़क उस काल में ‘सड़क-ए-आजम’ के नाम से पुकारी जाती थी।
२. आगरा से बुरहानपुर तक।
३. आगरा से जोधपुर और फिर चित्तौड़ तक।
४. लाहौर से मुल्तान तक।

शेरशाह ने सड़कों के किनारे 1,702 सराएँ बनवाई थीं। प्रत्येक सराएँ में एक कुआँ एक मस्जिद तथा एक राजकीय कमरा होता था तथा एक पुलिस अफसर (शिकदार)रहता था। सरायों में हिन्दुओं और मुसलमानो के ठहरने के लिए अलग-अलग व्यवस्था थी। ये सराएँ “साम्राज्य-रूपी शरीर की धमनियां थीं।”

(9) डाक-विभाग – शेरशाह ने डाक-विभाग को भी उन्नत किया था। सड़क के किनारे बानी हुई सराएँ डाक-विभाग अथवा डाक चौकियों का भी काम करती थीं। डाक पैदल घोड़ों और पैदल हरकारों द्वारा भेजी जाती थी प्रत्येक सराएँ में डाक ले जाने के लिए दो घोड़ों का प्रबंध रहता था।

(10) इमारतों का निर्माण -शेरशाह को इमरतों के निर्माण का बड़ा शौक था। उसने अपने पॉँच साल के शासन काल में जिन इमारतों का निर्माण करवाया वे स्थापत्य-काल का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। उसने पंजाब में झेलम नदी के तट पर रोहतासगढ़ नामक नगर का निर्माण करवाया। उसने सहसराम के झील के किनारे अपना भव्य मकबरा बनवाया जो भारत की श्रेष्ट इमारतों में से एक है। उसने एक जामा मस्जिद तथा रोहतास,दिल्ली,कन्नौज, पटना अदि स्थानों पर दुर्गो का निर्माण करवाया।

(11) सार्वजानिक कार्य – शेरशाह ने जनसाधारण की भलाई के लिए अनेक सराय, औषधालय और दान-शालाओं का निर्माण कराया था। उसके भोजनालय में सहस्त्र व्यक्ति प्रतिदिन भोजन करते थे। वह अनाथों, विधवाओं और साहित्यकरों को बहुत अधिक दान देता था।
शेरशाह ने अनेक पाठशालाएँ खुलवायीं जिनमे योग्य छात्रों को छात्रवृतियाँ मिलती थी मिलती थीं। उसने उच्च शिक्षा की प्राप्ति के लिए मदरसे भी खुलवाये।
इस प्रकार शेरशाह ने अल्पकाल में ही एक ऐसी सुव्यवस्थित शासन-प्रणाली स्थापित की जिसके कारण वह इतिहास में सदा के लिए अमर हो गया।

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