The Grand Trunk Road Maker : Sher Shah Suri ( ग्रांड ट्रंक रोड निर्माता : शेरशाह सूरी ) Part-1

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परिचय – हसन ख़ान की पहली पत्नी के गर्भ से सन 1472 में फरीद (शेरशाह) का जन्म हुआ था। फरीद अफगान जाती के ‘सूर’ नामक काबिले का था। उसका पितामह इब्राहिम घोड़ो का सौदागर था। उसका पिता बिहार की एक जागीर का जागीदार था। हसन ने चार विवाह किये थे। उसके कुल आठ लड़के पैदा हुए थे। फरीद और निजाम पहली पत्नी से, सुल्तान और अहमद सबसे छोटी पत्नी से उत्पन्न हुए थे। हसन फरीद और उसकी माँ से प्रेम नहीं करता था। फरीद की विमाता उसको उपेक्षा और धृणा की दृष्टि से देखती थी। जिसके कारन फरीद का प्रारंभिक जीवन काफी कष्टमय बिता। इस पारिवारिक कलह से तंग आकर बाईस वर्ष की अवस्था में वह अध्ययन के लिए जौनपुर चला गया।

शिक्षा – जौनपुर उस समय इस्लामी शिक्षा और संस्कृति के लिए केंद्र था। यहाँ रहकर फरीद ने अरबी और फ़ारसी का अच्छा अध्यन किया। उसने फारसी साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथों – ‘गुलिस्तां’, ‘सिकन्दरनामा’, ‘शाहनामा’ तथा ‘बोस्ता’ आदि का अध्ययन किया। वह बड़ा ही कुशाग्र बुद्धि था। उसकी कुशाग्र बूद्धि से जौनपुर का गवर्नर जमाल खान भी बहुत प्रभावित हुआ उसने पिता-पुत्र में समझौता करा दिया।

जागीर का प्रबन्ध – शिक्षा पूरी करने के बाद फरीद सहसराम आ गया और अपने पिता की जागीर का प्रबंध करने लगा। 21 वर्षो तक वह यह कार्य सफलतापूर्वक करता रहा। इसी समय उसने भूमि कर व्यवस्था में मत्वपूर्ण सुधार किये और लगान की दर निश्चित कर दी तथा लगान समय पर जमा करना प्रत्येक किसान के लिए अनिवार्य नियम बना दिया। उसने किसानों के हितों का पूरा-पुरा ध्यान रखा और उन भृष्ट अधिकारियों को दण्डित किया जो नाजायज लगन वसूलते थे। उसके इस सुधार का वांछनीय परिणाम निकला, किन्तु उसकी इस सफलता से उसकी विमाता फिर ईर्ष्या करने लगी।

गृह-त्याग तथा पुनः वापसी – फरीद ने अपनी विमाता के दुर्व्यवहार से तंग आकर 1518 में पुनः गृह का परित्याग कर दिया। वह दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के दरबार में पुनः जागीर प्राप्त करने के लिए पहुँचा, परन्तु सुल्तान ने उसकी कोई सहायता नहीं की। संयोगवश इसी वर्ष हसन की मृत्यु हो गई। अतः इब्राहिम ने शाही फरमान द्वारा सहसराम की जागीर फरीद को दे दी। अतः वह 1520-21 में सहसराम लौट आया।

बिहार का उप-गवर्नर- सहसराम आने पर उसके सौतेले भाई सुलेमान से उत्तराधिकारी का झगड़ा प्रारम्भ हो गया। उसने जागीर के बटवारे करने की बात कही, किन्तु फरीद उसके लिए तैयार नहीं हुआ और दक्षिण बिहार के शासक बहार खान की अधीनता में नौकरी कर ली। उसकी लगन और तत्परता देखकर बहार खान ने उसे अपने पुत्र का शिक्षक नियुक्त कर दिया। एक दिन फरीद ने शिकार के समय तलवार के एक ही वार में एक शेर का वध कर दिया, जिससे प्रसन्न होकर बहार खान ने उसे ‘ शेरख़ाँ ‘ की उपाधि प्रदान की। इसके बाद वह दक्षिण बिहार का उप-गवर्नर बन गया।

लेकिन शेरखाँ की बढ़ती हुई शक्ति देखकर अन्य अफगान सरदार उससे ईर्ष्या करने लगे। उन्होंने एक षड्यंत्र रचकर बहार खान को समझाया की वह उसके विरुद्ध महमूद लोदी का समर्थक है। परिणामतः बहार खान ने शेरखाँ को वहाँ से बहार निकल दिया और समस्त जागीर अपने कब्जे में ले लिया। एकबार फिर शेरख़ाँ गृहविहीन हो कर नौकरी की खोज में निकल पड़ा।

शेरखाँ और मुगलों का सम्बन्ध – बिहार के शासक बहार खान के यहाँ से शेरखाँ जौनपुर के गवर्नर जुवैद के यहाँ चला गया। जुवैद ने शेरखाँ का परिचय बाबर से कराया। वह बाबर की सेना में भर्ती हो गया। पूर्व में अफगानों के विरुद्ध शेरखाँ ने बाबर का साथ दिया, और इससे प्रसन्न हो कर बाबर 1528 में शेरखाँ को उसकी जागीर वापस दिल दी, परन्तु उसका मुगलों से सम्बन्ध शीघ्र ही ख़राब हो गया। इन्ही दिनों जलाल खां की माँ दूदू बीबी ने शेरखाँ को राज्य का प्रबन्ध करने के लिए बुलावा भेजा। अतः वह मुगलों की नौकरी छोरकर बिहार चला गया।

उपगवर्नर के पद की पुनः प्राप्ति – जलाल खान की माँ दूदू बीबी ने शेरखाँ को फिर से उसका संरक्षक बना दिया और बिहार का उप-गवर्नर भी नियुक्त कर दिया। कुछ दिनों बाद दूदू बीबी की मृत्यु हो गई और शासन की समस्त सत्ता शेरखाँ के हाथ में आ गई। उसने सेना का पुनः संगठन किया ओर अपने विश्वासपात्र व्यक्तियों को सेना के उच्च पदों पर नियुक्ति की। उसने बड़ी योग्यता से से शासन व्यवस्था का संगठन किया। इससे उसके प्रतिष्ठा तथा मान में वृद्धि हुई और वह शीध्र ही बिहार में लोकप्रिय हो गया।

शक्ति-उत्कर्ष – शेरखाँ ने 1529 में बंगाल के शासक नासरतशाह कोई बुरी तरह परास्त किया। उसके इस कार्य से उसकी प्रतिष्ठा में और वृद्धि हो गई। जलाल खां दहकशीं बिहार से चला गया और पूरी सत्ता शेरखाँ के हाँथ में चली आई, किन्तु उसने किसी राजसी उपाधि को धारण नहीं किया। और ‘ हजरत-ए-अला ‘ की साधारण पदवी लेकर राज्य के कार्यों का सञ्चालन करने लगा। 1530 में चुनार के एक पूर्व गवर्नर ताज खां की विधवा पत्नी लाद मालिका से विवाह कर के उसने चुनार को अपने अधिकार में कर लिया। जिससे उसकी सैनिक और आर्थिक स्तिथि बहुत बजबूत हो गई क्योंकि वहाँ से उसको बहुत अधिक धन प्राप्त हुआ था।

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