Social status in the Vedic period | आर्य-सभ्यता (वैदिक-काल) सामाजिक दशा | part-5

acadeichub/vedic period part-2
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 ‘ सामाजिक दशा ‘ –

वैदिक आर्यों का सामाजिक जीवन बहुत ही सादा था। इस समय समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – चार वर्ण थे। इनमें शादी-विवाह और खान-पान का प्रचलन था। आगे चलकर इस प्रचलन में जटिलता आ गई। आर्यों के सामाजिक जीवन को निम्न आधारों में विभाजित किया जा सकता है :-

(क) कुटुम्ब –कुटुम्ब पैतृक सिद्धान्तों पर आधारित था जिसमें गृहपति की आज्ञा का पालन करना सबके लिए अनिवार्य था। कुटुम्ब में सभी व्यक्तियों के लिए कार्य विभाजित थे। लेकिन प्रत्येक सदस्य को अपना कार्य पूर्ण करना आवश्यक था अन्यथा वह दंड का भगी होता था। कुटुम्ब में पत्नी का विशेष सम्मान होता था। पिता-पुत्र के सम्बन्ध भी अच्छे थे। पिता के मृत्यु के बाद उसके संपत्ति का अधिकारी पुत्र होता था न कि पुत्री। परन्तु पुत्र न होने पर सम्पत्ति का अधिकार पुत्री को मिलता था। जितना आनन्द पुत्र के जन्म पर होता था उतना पुत्री के जन्म पर नहीं होता था इस प्रकार की संयुक्त परिवार-प्रणाली में प्रेम और आदर परिवार का आधार था।

(ख) स्त्रियों की दशा – वैदिक काल में स्त्रियों का बड़ा आदर और सम्मान था। स्त्रियाँ गृहस्वामिनी होती थीं। विवाह के पूर्व कन्याएँ अपने पिता के संरक्षण में रहती थीं। स्त्रियों को धार्मिक समारोह में भाग लेने का पूर्ण अधिकार था। कुछ स्त्रियाँ, जैसे – घोषा।, शची, पौलोमी, कक्षावृती, सिकता, निवारी, लोपामुद्रा, और विश्ववारा ऋषियों की श्रेणी में आती थीं, क्योंकि इन्होने ऋचाओं की रचना की थी। स्त्रियों में पर्दा- प्रथा नहीं थी। वैदिक काल में सती-प्रथा प्रचलित नहीं थी। सुशिक्षित वीरांगनाओं को अपना जीवनसाथी चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। बाल विवाह अज्ञात है। धार्मिक कार्यों में पत्नी, पति की सहकारी होती थी।

(ग) विवाह-पद्धति – यधपि राजाओं में बहुविवाह होते थे, लेकिन एक स्त्री से विवाह ही आदर्श विवाह की श्रेणी में आता था। भाई-बहनों और पिता-पुत्री में विवाह पूर्णतया वर्जित था विवाह के पश्चात कन्याएँ पति के घर चली जाती थीं। विवाह में दहेज-प्रथा प्रचलित थी। विवाह का प्रमुख उद्देश्य संतान उत्पन्न करना था। संतान के रहते विधवा स्त्री अपना पुनर्विवाह नहीं कर सकती थी। यदि संतान नहीं होती तो विधवा स्त्री अपने देवर से ब्याह कर सकती थी। उस समय विवाह आठ प्रकार से प्रचलित थे, जिनमें ‘राक्षस’ और ‘पैशाच’ विवाह आग्रहणीय माने जाते थे। ‘गांधर्व’ और ‘ब्राह्म’ में ब्राह्म विवाह अधिक प्रचलित था।

(घ) आहार – आर्य लोग दूध, धी, पनीर का सेवन करते थे। जो लोग मांस प्रेमी थे, बकड़ी और भेड़ का मांस खाते थे। गाय को मरना ‘जघन्य’ समझा जाता था विवाह- शादी के अवसरों पर अतिथि-सत्कार के लिए बैल का मांस प्रयुक्त होता था। मुज्वंत पर्वत में उगने वाली सोमलता से एक विशेष प्रकार का रास तैयार करते थे जिसे वे बड़े चाव से पीते थे। कुछ लोग ‘सूरा’ नाम की नशीली शराब का सेवन करते थे जिनके कारण उनकी सभाओं में मार-पीट की नौबत आ जाती थी। यह आश्चर्य की बात है कि आर्यों के भोजन में नमक का उल्लेख नहीं मिलता।
(च) पोषक और आभूषण – आर्यों को सादगी पसंद थी। वे प्रायः तीन वस्त्र धारण करते थे – (1 ) नीवी – जो कमर के नीचे पहना जाता था अर्थात जो स्त्रियों और पुरुषों के लिए धोती की भाँति था। (2 ) वास -जो शरीर पर धारण किया हुआ अंगरखा सरीखा होता था और (3) अधिवास – जो ऊपर से धारण किया जाता था अर्थात जो चादर या ओढ़नी की भाँति था। उनके वस्त्र प्रायः भेंड़ के ऊन के होते थे। उनके वस्त्रों पर बेल-बूटे कढ़े होते थे। ब्रह्मचारी लोग चर्माम्बर ( अजिन ) का परिधान बनाते थे। स्त्री-पुरुष दोनों कर्णफूल, मालाएँ, कंठा, अंगूठियाँ, हाथों और पैरों के कड़े और रत्नों का प्रयोग करते थे।

(छ) आमोद – प्रमोद – आर्य लोग मनचले और मनोविनोद के प्रेमी थे। धार्मिक और सामाजिक समारोहों में युवकों और युवतियों में मैत्री और प्रेम हो जाता था। युवक, युवतियों को प्रसन्न करने के लिउए तन, मन, धन और सुमधुर वचनों से अनेक प्रयास करते थे। आर्यों को जुआ खेलने का व्यसन था। वे कुछ न रहने पर अपने शरीर तक को दाँव में लगा देते थे। इसके अतिरिक्त विभिन्न अवसरों पर रथ की दौड़ और घुड़-दौड़ का आयोजन होता था। नाचने, गाने और बजाने का स्त्री -पुरुष दोनों को शौक था। हाथ से और फूँककर बजाने के उनके कई प्रकार के बाजे थे। इनमें वीणा,तूर्य, नावी, भृंग, शंख और दुन्दुभी आदि प्रमुख थे। विजय का बाजा दुन्दुभी ( ढोल ) था।

(ज) विद्या और साहित्य – वैदिक आर्यों का जीवन आदर्शमय था। विद्यार्थी गुरुओं के घर पर वेदों का अध्ययन करते थे। धारणाशक्ति के बिना विद्यार्थियों का काम नहीं चल सकता था, क्योंकि उन्हें वेद-वेदांत सस्वर याद करने पड़ते थे। उच्चारण और स्वर में जरा-सी भूल अक्षम्य थी। ध्वनि, स्वर और शब्द-विद्या काफी उन्नत दशा में थी। वैदिक शब्दों, स्वरों और वाक्यों की शुद्धता के लिए ‘प्रातिशाख्य’ और ‘अनुक्रमणी’ की रचना की गई थी।

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