Vedic Economic religious conditions | वैदिक काल में आर्थिक, धार्मिक दशा | part-6

आर्य-सभ्यता (वैदिक-काल) part-6

acadeichub/vedic period part-2
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र्यों के आर्थिक जीवन को निम्नलिखित शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है :-

‘ आर्थिक दशा ‘ –

(क) कृषि – आर्यों की आर्थिक व्यवस्था का मूलाधार कृषि तथा पशुपालन था। ये हलों में बैलों को जोतते थे। उर्वरा भूमि की जुताई में छः, आठ और बारह बैलों का प्रयोग करते थे। खेतों की कुओं, झीलों, नहरों और नालियों आदि से सिंचाई करते थे। वे ‘शकन’ और ‘करिश’ नामक खाद खेतों को उपजाऊ बनाने के लिए प्रयोग करते थे। वे चावल, जौ, सरसों, तिल, मसूर, गेहूँ आदि की पैदावार करते थे। अतिविशिष्ट, टिड्डी, कीड़ों और पक्षियों से खेतों को भय रहता था।

(ख) पशु-पालन – आर्य जोतने और बोझा ढोने के लिए बैल रखते थे। सवारी, घुड़-दौड़ तथा युद्ध के लिए घोड़े रखते थे। इनके अतिरिक्त गाय, भैंस, बकरी, भेड़, गधे और कुत्ते भी पालते थे। पशुओं के कान पर उनके स्वामी का चिन्ह अंकित कर दिया जाता था। ‘गोपाल’ पाशुओं को ‘गोष्ठ’ में चराने ले जाते थे।

(ग) उद्योग-धन्धे – बढ़ई ( तक्षण ) रथ और गाड़ियाँ बनाते थे तथा लकड़ी पर नक्काशी का काम भी करते थे। लोहार (कर्मार) धातु के बर्तन बनाते थे। सोनार सोने के आभूषण बनाते थे। कपड़ा बनाने वाले करधों पर कपड़ा बुनते थे.स्त्रियां बेल-बुटे का काम, कताई, चटाई की बुनाई और पिसाई का काम करती थीं।

(घ) व्यापार – व्यापार विनिमय द्वारा होता था। विनिमय का मान गाय होती थी किन्तु ‘निष्क’ नामक सोने के सिक्के भी प्रचलित थे। व्यापारिक वर्ग ‘पणि’ कहलाता था। जमीन का व्यापार नहीं होता था, यद्यपि उस पर स्वामी का अधिकार माना जाता था। कर्ज की भी प्रथा थी। मूल का आठवाँ अथवा सोलहवाँ अंश शायद सूद में लिया जाता था। स्थल के अतिरिक्त जलमार्ग से भी नावों द्वारा व्यापार होता था।

आर्यों के धर्मीक जीवन को निम्नलिखित शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है :-

‘ धार्मिक दशा ‘ 

(क) प्रकृति की उपासना –

आर्यों का धर्म बहुत सरल था कृषि-प्रधान तथा पशु-पालक सभ्यता का प्रकृति की उपसना करना स्वाभाविक था। प्रकृति के रूप में आर्य अनेक देवताओं की पूजा किया करते थे। पृथ्वी, सोम, अग्नि, इन्द्र, वायु, मरुत, सूर्य, आदि की वे उपासना करते थे।

(ख) एकेश्वरवाद में विश्वास –

उक्त विभिन्न देवताओं की स्तुति के कारण मैसमूलर तथा मैकडोनाल्ड सरीखे पाश्चात्य विद्वानों ने आर्यों के धर्म को बहु-देववादी माना है। वास्तव में ये विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों और देवतागण एक परम परमात्मा के अंश है। उनकी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। अतः आर्य एकेश्वरवादी थे। आर्य इस सत्य से भली-भाँति परिचित थे की सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक सत्ता विद्यमान है। इस युग के ऋषियों ने इस तथ्यका निरूपण करते हुए कहा कि ‘सत’ एक ही है विद्वान उसे अग्नि, याम और मातरिश्वा आदि भिन्न नामों से पुकारते हैं।

(ग) प्रवित्तिमार्गी धर्म –

आर्यों को जीवन से बहुत प्रेम था। उनका धर्म प्रवित्तिमार्गी था। गृहस्थी में रहकर ही वे देवोपासना के द्वारा कल्याण प्राप्त करते थे। उनके जीवन में संन्यास या गृहत्याग जैसी पलायनवादी भावनाएँ नहीं थीं। ऋग्वेद में परमशक्ति से अनेक बार शतवर्षीय आयु, धनधान्य और विजय की कामना की गई है। इस प्रकार उनका जीवन उल्लासपूर्ण तथा अनुरागमय था।

(घ) यज्ञ –

वैदिकधर्म में मूर्ति-पूजा व् देवालयों का स्थान न था। आर्यों ने एक निराकार ईश्वर की पूजा की थी। स्तुति और यज्ञ उनकी पूजा के साधन थे। अग्निकुण्ड में अग्नि प्रज्वलित कर घी, दूध, धान्य की आहुति देकर उसके चारों ओर वे मंत्रों का उच्चारण करते थे। उनका विश्वास था कि यज्ञों में समर्पित आहुति सीधे देवताओं तक पहुँचती है। कालान्तर में पशुबलि तथा पुरोहितों का यज्ञ में जोर हो गया। आर्य आत्मवादी थे। पाप, पुण्य, स्वर्ग और नरक की कल्पना उन्हें थी। पुण्यकर्मी मनुष्य मृत्यु के पश्चात् सीधे स्वर्ग जाता है, ऐसा उन्हें विश्वास था।

(च) नैतिक आदर्श –

आर्यों के धर्म की आधारशिला कोरे दर्शन पर नहीं, अपितु शुद्ध आचरण तथा नैतिक आदर्श पर आधारित थी। चरित्र की शुद्धता, अतिथि-सत्कार, सदाचार, दानशीलता तथा पड़ोसी के प्रति उदारता पर वैदिक आर्यों ने प्राप्त बल दिया है। ऋग्वेद में एक स्थान पर प्रार्थना की गई है – ”हे देव, हमने किसी के प्रति पाप किया हो, किसी का अहित किया हो अथवा पड़ोसी या किसी को क्रूर कष्ट दिया हो, तो हमें पाप से मुक्त कर दो।”
इस प्रकार आर्यों का धर्म मानव-कल्याण के लिए था।

आर्य-सभ्यता (वैदिक-काल) part-1

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद । आर्य सभ्यता (वैदिक काल) part- 2

ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद,वेदांग आर्य-सभ्यता (वैदिक-काल) part-3

 

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