ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद । आर्य सभ्यता (वैदिक काल) part – 2

acadeichub/vedic period part-2
acadeichub/vedic period part-2

आर्यों का भारत में प्रसार – 

आर्यों के मूल निवास-स्थान के सम्बन्ध में आज भी विवाद है। किन्तु अधिकतर मान्यता उस प्रदेश की है जो समुन्द्र से डेन्यूब नदी तक फैला हुआ है। अनुमान किया जाता है कि आर्यों ने कम-से-कम चार या साढ़े चार हज़ार वर्ष पूर्व भारत-भूमि में उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर से प्रवेश किया। मार्ग में अपने दल इधर-उधर छोड़ते गए। वे सबसे पहले अफगानिस्तान और पंजाब में बसे । आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में अफ़ग़ानिस्तान की काबुल, खुर्रम, स्वात तथा गोमल नदियों एवं पंजाब की सात नदियों-सिंधु, झेलम (वितस्ता) , चिनाब (अस्कनी ), रावी (परुष्णी ) , व्यास (विपासा) , सतलज (शतुद्रि ) और सरस्वती आदि का उल्लेख मिलता है। इन सात नदियों के नाम पर इस प्रदेश का नाम आर्यों ने सप्त सिंधु’ या ‘सप्त सैंधव’ रखा। यहीं आर्य-सभ्यता का बीजारोपण हुआ और यहीं से आर्य लोग भारत में फैले। Vedic Periodvedic period

आर्यों के कबीले अथवा पारस्परिक युद्ध – आर्य अनेक कबीलों अथवा जनों में विभक्त थे। इनमे ‘पंचजन’ विशेष प्रसिद्ध थे। इनके नाम थे- (1) अनु, (2) द्रुहयु , (3) यदु, (4) तुर्वसु और (5) पुरु। ये पांचों ‘जन’ एक साथ संगठित थे और सरस्वती के दोनों तटों पर रहते थे। इनके अतिरिक्त अन्य ‘जन’ भी थे,जिनमे भरत ,क्रिवि ,त्रिस्सु और सृंज विशेष उल्लेखनीय हैं। ये ‘जन’,प्रायः परस्पर लड़ते थे । इनके पारस्परिक युद्धों में सर्वप्रमुख युद्ध ‘दाशराज्ञसमर’ अर्थात ‘दस राजाओं का युद्व था। युद्ध का प्रमुख कारण यह था कि आर्यों के भरत ‘जन’ के राजा सुदास ने विश्वामित्र को कुल-पुरोहित पद से हटाकर वशिष्ठ को कुल-पुरोहित पद दे दिया था। विश्वामित्र इस अपमान से बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने निकटवर्ती दस राजाओं का एक संघ बनाया और उसकी सहायता से राजा सुदास पर आक्रमण कर दिया। परुष्णी (रावी) नदी के तट पर दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में सुदास विजयी हुआ। उसने संघ की सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया।

आर्य सप्त सिंधु प्रदेश से पूर्व की ओर बढे, लेकिन इन्हे अनार्यों से युद्ध करना पड़ा। अनार्यों को पराजित करके इन्होंने सरस्वती, दृषद्वती और आपया नदियों की भूमि पर अधिकार कर लिया और इसका नाम ‘ब्रह्मावर्त’ रखा।

अनार्यों को पराजित करने के उपरान्त आर्य ब्रह्मावर्त से आगे की ओर बढे और इन्हों गंगा-यमुना के दोआब और उसके पास के प्रदेशों पर अपना आधिपत्य स्थापित करके इस भूमि का नाम ‘ब्रह्मर्षि’ देश रख दिया। इसी प्रकार हिमालय तथा विंध्य प्रदेश को जीतकर उसका नाम ‘मध्य प्रदेश’ रखा। कालांतर में बिहार और बंगाल का दक्षिणी-पूर्वी भाग भी आर्यों के आधिपत्य में आ गया।

इस प्रकार हिमालय पहाड़ से दक्षिण में विंध्याचल तक तथा पूर्वी समुन्द्र से पश्चिमी समुन्द्र तक के सम्पूर्ण भाग का नाम आर्यों ने ‘आर्यावर्त ‘ रखा। धीरे-धीरे आर्य दक्षिण भारत में भी फैल गए और दक्षिण भारत को आर्यों ने ‘दक्षिण पथ ‘के नाम से पुकारा।

वैदिक साहित्य – आर्यों की साहित्य को हम निम्नलिखित भागों में विभक्त कर सकते है : –

(1) वेद – आर्यों के सर्वोत्तम ग्रन्थ वेद हैं। वेद शब्द ‘विद’ धातु से निकला है जिसका अर्थ है ‘जानना’। साधारणतया इसका अर्थ ‘ज्ञान’ होता है। भारतीय परंपरा वेदों और अपौरुषेय अथवा ईश्वरनिर्मित मानती है। इसके अनुसार सृष्टि के आदि में ब्रह्मा ने कुछ ऋषियों को मन्त्रों का प्रकश दिया, ऋषियों ने उन्हें अपने शिष्यों को बताया। यह क्रम चलता रहा तथा यह ज्ञान श्रवण परंपरा से सुरक्षित रहा। कालांतर में व्यास ने इस ज्ञान को संकलित कर दिया। इसी कारण वेदों को ‘ श्रुति ‘ भी कहा जाता है। वेद संख्या में चार हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। इनमें ऋग्वेद सबसे अधिक प्राचीन एवं महत्वपूर्ण है।

‘ ऋग्वेद ‘- ऋग्वेद मन्त्रों का एक संकलन ( संहिता ) है जिसे यज्ञों के अवसर पर देवताओं की स्तुति के लिए ऋषियों द्वारा संगृहीत किया गया है। ऋग्वेद की अनेक संहिताएं बताई जाती हैं जिनमे केवल ‘शाकल संहिता ‘ही सम्प्रति उपलब्ध है। सम्पूर्ण संहिता में 10 मंडल तथा 1,028 सूक्तहैं। प्रत्येक सूक्त में अनेक मंत्र हैं। ऋग्वेद के मन्त्रों की संख्या लगभग 10,600 है। ऋग्वेद के मन्त्रों के रचयिता ऋषियों में गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज तथा वशिष्ठ विशेष उल्लेखनीय हैं।

ऋग्वेद के रचना-काल के विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। मैक्समूलर ई. पू. 1200 से 1000 इसकी तिथि मानते हैं। जैकोबी ने इसका रचना-काल 4500 ई. पू. बताया है। बाल गंगाधर तिलक ऋग्वेद के प्राचीनतम अंश को 6000 ई. पू. के आस-पास लिखा हुआ मानते हैं। परन्तु आज के विद्वान इतनी प्राचीन तिथि में विश्वास नहीं करते हैं। हम सामान्यतः इसे 1000 के लगभग रचित मान सकते हैं।

 ‘ यजुर्वेद ‘ -‘यजुष’ का अर्थ ‘यज्ञ’ होता है। अतः यजुर्वेद संहिता में विविध यज्ञों, उनके विधि-विधानों तथा अन्य कर्म-काण्डों का विस्तारपूर्वक विवेचन मिलता है। यजुर्वेद के दो भाग हैं – कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद की प्रमुख शाखाएँ – तैत्तिरीय, कठ, मैत्रायणी तथा कपिष्ठल हैं तथा शुक्ल यजुर्वेद की प्रधान शाखाएँ – याध्यान्दिन तथा काण्व हैं। इसी संहिताओं को ‘ वाजसनेय ‘ भी कहा जाता है, क्योंकि वाजसेनी याज्ञवल्क्य इसके द्रष्टा थे। यजुर्वेद की रचना ऋग्वेद के बाद हुई होगी।

‘ सामवेद ‘ – ‘ साम ‘ का अर्थ संगीत अथवा ‘गान’ होता है। इस संहिता में यज्ञों के अवसर पर गाए जाने वाले मन्त्रों का संग्रह है। सामवेद के दो प्रमुख भाग हैं – आर्चिक तथा गान। सामवेद में कुल 1,549 ऋचायें हैं। इनमें मात्र 78 ही नयी हैं अन्य ऋग्वेद से ली गई हैं। सामवेद को भारतीय संगीतशास्त्र का मूल कहा जाता है।

‘ अथर्ववेद ‘ – वैदिक संहिताओं में अथर्ववेद संहिता का अपना एक विशिष्ट स्थान एवं महत्व है। ‘अथर्वा’ नमक ऋषि इसके प्रथम द्रष्टा थे, अतः उन्हीं के नाम पर इसे ‘अथर्ववेद ‘ कहा गया। इसके दूसरे द्रष्टा ‘आंगिरस ‘ ऋषि के नाम पर इसे ‘अथर्वांग रस वेद ‘ भी कहा जाता है। अथर्ववेद की दो शाखायें- पिप्लाद और शौनक हैं। इस संहिता में कुल 20 काण्ड, 31 सूक्त तथा 5,987 मन्त्रों का संग्रह है। इसके लगभग 1,200 मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। रोग-निवारण, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, शाप, वशीकरण, आशीर्वाद, स्तुति, दीर्घायु, सुन्दर-वृष्टि, प्रायश्चित,विवाह, प्रेम, राजकर्म, मातृभूमि, माहात्म्य आदि विविध विषयों से सम्बंधित मंत्र अथर्ववेद से मिलते हैं।

ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद,वेदांग | आर्य-सभ्यता | वैदिक-काल part-3

2 COMMENTS

  1. […] आर्यों की आदि-भूमि – आर्यों के मूल स्थान के प्रश्न पर विद्वानों में बहुत मतभेद है। आज तक यह निश्चित नहीं हो पाया है कि आर्य कौन थे और वे भारत में कहाँ से आये अथवा भारत ही उनका मूल निवास -स्थान था। इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने भाषा-विज्ञान,शरीर-रचनाशास्त्र,पुरातत्व तथा शब्दार्थ विकास-शास्त्र के आधार पर चार सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है ;- arya-sabhyata Vedic Period part- 2 […]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here