ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद,वेदांग | आर्य-सभ्यता | वैदिक-काल part-3

acadeichub/vedic period part-2
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(2) ब्राह्मण ग्रन्थ – संहिता के पश्चात वैदिक साहित्य में ब्राह्मण ग्रंथों का स्थान है। वेदों का संक्षेपीकरण करने के लिए इन ग्रंथों की रचना की गयी। ये प्रधानतः गद्य -ग्रन्थ हैं जिनमें यज्ञों के सम्बन्ध में व्यक्त किये गए विचारों का उल्लेख है। इन ग्रंथों से आर्यों के राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है। ब्राह्मण ग्रंथों में ऋग्वेद का ऐतरेय, यजुर्वेद का शतपथ, सामवेद का पंचविंश तथा अथर्ववेद का गोपथ उल्लेखनीय हैं। vedic period

(3) आरण्यक ग्रन्थ – ब्राह्मण ग्रंथों के पश्चात आरण्यकों की रचना की गयी जो ब्राह्मणों के अंतिम भाग हैं। इनकी रचना आरण्यों अर्थात वनों में पढ़ाये जाने के निमित्त की गई थी। इसी कारण इन्हें ‘आरण्यक’ कहते हैं। इनमे यज्ञों के स्थान पर ज्ञान एवं चिंतन को प्रधानता दी गई है। प्राण-विद्या की महिमा का प्रतिपादन इनमें विशेष रूप से मिलता है। ‘आरण्यक ग्रंथों में ऐतरेय शांखायन, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, मैत्रायणी, तलवकार तथा यादयन्दिन उल्लेखनीय हैं।’

(4) उपनिषद – वैदिक साहित्य के अंतिम भाग उपनिषद हैं जिन्हें ‘वेदांत ‘ भी कहा जाता है। उपनिषद मुखयतः ज्ञानमार्गी रचनाएँ हैं। इनका मुख्य विषय ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन है। उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है उप = समीप + नि = निष्ठापूर्वक + सद = बैठना अर्थात गुरु के निकट निष्ठापूर्वक (रहस्य ज्ञान के प्राप्ति के लिए) बैठना। इस प्रकार उपनिषद वह साहित्य है जिनमें रहस्यात्मक ज्ञान एवं सिद्धांत का संकलन है। प्रमुख उपनिषद हैं- ईशोवास्य, केन, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, काठ, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, वृहदारण्यक आदि।

(5) वेदांग – वैदिक साहित्य को सरलता से समझने तथा वैदिक कर्मकांडों के प्रतिपादन में सहायता देने के निमित्त जिस नवीन साहित्य की रचना हुए उसे ‘वेदांग’ कहा जाता है। इनकी संख्या छह है- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद तथा ज्योतिष। इन सभी का उद्देश्य वैदिक साहित्य को संरक्षण प्रदान करना, उसकी व्याख्या करना तथा उसे व्यावहारिक प्रयोग के लिए उपयोगी बनाना था।

वैदिककालीन सभ्यता ( 1500-600 ई. पू. )

वैदिक काल को निम्न दो भागों में विभक्त किया जाता है :-
(1) ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिककालीन सभ्यता ( 1500-1 000 ई. पू.),
(2) उत्तर वैदिककालीन सभ्यता (1000-600 ई. पू. )

ऋग्वैदिककालीन सभ्यता या पूर्व वैदिककालीन सभ्यता –

स्रोत- ऋग्वैदिक काल के अध्ययन के लिए दो प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं :-
(क) पुरातत्विक साक्ष्य- ये साक्ष्य इस प्रकार हैं :-
1. चित्रित धूसर मृदभांड।
2. खुदाई में हरियाणा के पास भगवानपुरा में 13 कमरों वाला मकान मिला है तथा पंजाब में भी तीन स्थल ऐसे मिले हैं, जिनका सम्बन्ध ऋग्वैदिक काल से जोड़ा जाता है।
3. बोगाजकोइ अभिलेख ( 1400 ई. पू. ) में हित्ती राजा शुब्बिलिममा और मित्तानी राजा मतिउअजा के मध्य हुई संधि के साक्षी के रूप में वैदिक देवताओं- इंद्र, वरुण, मित्र और नासत्य को उदधृत किया गया है।
(4) कस्सी अभिलेख (1600 ई. पू.) से यह सूचना मिलती है की ईरानी आर्यों की एक शाखा भारत आयी।
(ख ) साहित्यिक साख्य – साहित्यिक साक्ष्य में मुख्यतः ऋग्वेद है। इसमें दस मंडल तथा 1028 सूक्त हैं। पहला तथा दसवां मंडल बाद में जोड़ा गया है जबकि दूसरा से सातवां मंडल पुराण है।

vedic political system | वैदिक-काल की राजनीतिक दशा | part- 4

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