vedic political system | वैदिक-काल की राजनीतिक दशा | part – 4

acadeichub/vedic period part-2
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राजनीतिक दशा – एक प्रसिद्ध पश्चिमी विद्वान ने मत प्रकट किया है कि भारत सहित प्राचीन पूर्वी सभ्यताओं में सामाजिक तथा राजनीतिक ढांचे पर गंभीर चिंतन नहीं किया गया है, यह पूर्णतया सत्य नहीं है। आर्यों ने राजत्व के विकास, राज्य की आवश्यकता, विभिन्न वर्गों का समाज के प्रति कर्त्तव्य अदि पर सभ्यता काल में ही चिंतन प्रारम्भ कर दिया था। आर्यों के राजनीतिक सिद्धांतों की अभिव्यक्ति धार्मिक ढांचे में हुई है। राजत्व के विकास के सम्बन्ध में ऐतरेय ब्राह्मण में देवासुर संग्राम और उसमें देवों के पराजय का वर्णन मिलता है। पराजय के कारण देवताओं ने विचार किया- “चूँकि हमारा राजा कोई नहीं है, दानव हमें हरा देते हैं, अतः हमें एक राजा चुनना चाहिए।” राजा का चुनाव किया गया और नरेश-प्रथा या राजतन्त्र का जन्म हुआ।

(क) राजा – राष्ट्र का अधिपति राजा शांति और युद्धकाल, दोनों में ही जन का नेता माना जाता था। राजा बड़े वैभव से महल में अनेक सेवकों के साथ निवास करता था। उसका चुनाव तथा उसके उत्तराधिकारी का चुनाव समिति करती थी। राजा का प्रमुख उद्देश्य जनकल्याण था।

राजा को तीन प्रकार के कार्यों को सम्पादित करना पड़ता था :-

( 1 ) युद्ध के अवसर पर सेनापति का कार्य करता था।
(2 ) समस्त प्रशासकीय कार्यों के लिए पूर्णतया उत्तरदायी था।
(3 ) न्याय सम्बन्धी समस्त कार्यों को स्वयं करता था।

( ख ) राज-कर्मचारी – राज्य के प्रमुख कर्मचारियों में पुरोहित, सेनापति ( सेनानी ) और ग्रामीण थे। सेनापति का कार्य युद्ध करना था। पुरोहित समस्त धार्मिक अनुष्ठानों को करता था। ग्रामीण गाँव का मुखिया होता था।

( ग ) समिति तथा सभा – राजा पर दो संस्थाओं – समिति और सभा का नियंत्रण था। समिति समस्त जनता की बड़ी संस्था और सभा वृद्धजनों की छोटी और चुनी हुई संस्था थी। राजा इनकी सलाह से ही कार्यों को सम्पादित करता था। समिति का प्रधान ‘ईशान’ कहलाता था। राजा का निर्वाचन, निष्कासन अथवा पुनः निर्वाचन समिति करती थी। सभा और समिति के कार्य तथा अंतर अधिक स्पष्ट नहीं हैं।

( घ ) राजनीतिक संगठन – राजनीतिक संगठन का मूलाधार गृह अथवा कुल था। कुलपति की आज्ञा सबके लिए ग्राह्य थी। कई कुलों के संगठन से ग्राम का निर्माण होता था, जिसका नेता ‘ग्रामीण’ होता था। ग्राम के वृहत संगठन को ‘विश’ कहते थे जो ‘विशपति’ के अधीन होता था और विशों से बड़े संगठन को ‘जन’ या ‘जनपद’ कहते थे जिसका प्रधान ‘राजन’ होता था। राज्य के लिए ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग किया जाता था।

( च ) युद्ध-प्रणाली – वैदिक आर्य स्वभावतया शांतिप्रिय थे। परन्तु अवसर आने पर युद्ध के लिए तैयार हो जाते थे और समस्त युवक युद्ध में भाग लेते थे। सेना में पैदल और रथी रहते थे। रथों में घोड़े जाते जाते थे और वह चमड़े के खोल से मढ़ा होता था। युद्ध में घुड़सवार अथवा हाथियों की सेना का प्रयोग देखने में नहीं आता था। सैनिक धनुष-बाण, फरसा, बर्छे, भाले, असि और गोफनों का प्रयोग करते थे। शरीर-रक्षा हेतु धातु के निर्मित वर्म, अत्क, हस्तध्न, शिरस्त्राण आदि पहनते थे। इनका युद्ध, धर्म पर आधारित रहता था और ये शरण में आये हुए को मुक्ति – दान प्रदान करते थे।

Social status in the Vedic period | आर्य-सभ्यता (वैदिक-काल) सामाजिक दशा | part-5

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