(What is veto power ? Why China used the veto against India?) ‘ वीटो ‘ पावर क्या है? क्यों चीन ने भारत के खिलाफ वीटो का इस्तेमाल किया?

veto power

किसी भी देश को दुनिया के सामने प्रदर्शित करने का काम उस देश की विदेश सेवा करती है, विदेश सेवा के अपसर और उस देश की विदेश नीति के सहारे ही कोई देश दुनिया के सामने आगे बढ़ता है या विकसित होता है। 

         भारत की पूरी विदेश नीति की ऊर्जा का नब्बे प्रतिशत हिस्सा कश्मीर विवाद और पाकिस्तान ले जाता है।  भारत के पास कुछ बचता  ही नहीं कि भारत अपनी पौढता और काबिलियत के सहारे बाकि दुनिया के बड़े व विकसित देशो के बीच उभर के आय। चीन  के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है और इस लिए चीन यह नहीं चाहता है कि भारत इस समस्या से बाहर आए और अपनी शक्ति को दुनिया के सामने प्रदर्शित करे।  इसलिए चीन लगातार ये प्रयास करता है की भारत इस समस्या में उलझे रहे और इसी में फसा रहे।  इसी का उदहारण चीन ने फिर दिया है, जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के मसूद अजहर के खिलाफ प्रस्ताव पर चीन ने तीसरी बार वीटो करके ख़ारिज करवा दिया।  इसके पहले भी चीन ने 2010 में भारत के इसी प्रस्ताव पर वीटो करके रोक दिया था। और इस प्रस्ताव को भारत द्वारा फिर लाने  में छ; साल लग गया, और पुनः चीन ने इसपर वीटो कर के ख़ारिज करवा दिया है संयुक्त राष्ट्र में किसी भी प्रस्ताव पर तीन बार वीटो पड़ने के  बाद उस प्रस्ताव को सिरे से ख़ारिज कर दिया जाता है।

 वीटो पावर क्या है –

‘ वीटो ‘ एक लैटिन शब्द है, और इसका मतलब किसी मुद्दे पर अपनी ‘ असहमति ‘ दर्ज करना होता है। इन दिनों  हम वीटो  पावर का अर्थ आमतौर पर ‘ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिसद ‘ के पांच स्थाई सदस्य देशो को प्राप्त विशेष अधिकार से लगाते  है।  ये देश है अमेरिका , रूस , ब्रिटेन ,चीन और फ्रांस। इसमें से कोई भी सदस्य ‘संयुक्त राष्ट्र ‘ में किसी भी प्रस्ताव को वीटो कर के रोक  सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि ‘संयुक्त राष्ट्र में किसी भी प्रस्ताव को पारित होने के लिए इन पांचो देशो की मंजूरी होनी चाहिए इनमे से किसी एक ने भी प्रस्ताव पर वीटो किया तब वो प्रस्ताव पारित नहीं होगा। इसका परिणाम यह होता है कि ये पांचो देश ‘ संयुक्त राष्ट्र ‘ में अपने – अपने राजनैतिक हितों को साधने  लगते है परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र वैश्विक राजनीति का एक अखाड़ा बन कर रह गया है।  


  ‘ संयुक्त राष्ट्र ‘ की  स्थापना कब, और क्यों हुई –

 ‘ संयुक्त राष्ट्र ‘ के बारे में जानने के लिए हमें ‘ लीग ऑफ़ नेशन्स ‘ के बारे में जानना होगा, जो संयुक्त राष्ट्र के जैसी ही एक संस्था थी जो संयुक्त राष्ट्र के स्थापित होने से पहले संचालित थी।  ‘ लीग ऑफ़ नेशन्स ‘ के टूटने के बाद , संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई।  संयुक्त राष्ट्र ‘ लीग ऑफ़ नेशन्स ‘ का ही एक परिवर्तित रूप है।  

‘ लीग ऑफ़ नेशन्स ‘ –

यह एक अंतर – सरकारी संगठन थी जिसकी स्तापना 10 जनवरी 1920 को हुई थी और पेरिस शांति सम्मेलन के समाप्त होने के बाद परिणाम के रूप में निकल कर आई।  ‘ लीग ऑफ़ नेशन्स ‘ प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्थापित हुआ और इसका मकसद था की विश्व में शांति बना रहे और फिर कभी ऐसी विश्व युद्ध न हो।  परंतु यह संगठन ऐसा करने में असफल रहा और दुनिया को द्वितीय  विश्व युद्ध भी झेलना पड़ा। 1920 से 1946 तक रहे इस संस्था के ‘ लीग काउन्सिल ‘ के सदस्यों के पास भी ‘ वीटो ‘ पावर का अधिकार था फर्क बस इतना था कि उनके चार स्थाई और चार अस्थाई सदस्यों के पास ये वीटो पावर थी।  1936  में ‘ लीग काउंसिल ‘ के अस्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ कर 11 हो गई और इसके साथ ही 15 देशों के पास ‘वीटो ‘ पावर आ गई। ‘ लीग ऑफ़ नेशन्स ‘ के विफलता का प्रमुख कारण ‘ वीटो ‘ पावर भी था। 

” संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ” –

 बावजूद इसके 24 अक्टूबर 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक नए अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना की गई जो ‘लीग ऑफ़ नेशन्स ‘ का प्रतिस्थापन था , जिसे हम आज संयुक्त राष्ट्र के नाम से जानते है।  इसमें अमेरिका , रूस , चीन , ब्रिटेन के साथ – साथ फ्रांस को भी ‘ वीटो ‘ पावर का अधिकार देने का फैसला किया गया। संयुक्त राष्ट्र का भी मूल उद्देश्य वही है , दुनिया में शांति व्यवस्था बनाये रखना और विश्व युद्ध जैसी सम्भावनाओं को उत्पन्न न होने देना।

                 लेकिन अगर ‘चीन ‘ जैसे देश आतंकवाद व आतंकवादी संगठनों के बचाव के लिए अपने अधिकारों का दुर्पयोग ऐसे  ही करते  रहेंगे तो शायद संयुक्त राष्ट्र के मूल मकसद की प्राप्ति कठिन होगी। तथा ऐसे में ‘ संयुक्त राष्ट्र ‘ के कार्य प्रणाली और विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाजमी है।  

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